शुक्रवार, 30 दिसंबर 2022

 भारत जोड़ो यात्रा और राहुल गाँधी की छवि

क्या भारत जोड़ो यात्रा राहुल गाँधी की छवि बदल पायेगी और किस हद तक ।
मार्केटिंग में एक बहुत बड़ा फंडा ये है कि जो दिखता है वो बिकता है और यह आज की राजनीति का यथार्थ बन गया है । राजनेता को एक ब्रांड के रूप में स्थापित करना तथा उसके इर्द गिर्द ही पुरे चुनाव को केंद्रित कर देना इस बात का द्योतक है कि जनता के समसामयिक मुद्दे को किस हद तक प्रभावित किया जा सकता है । 

अभी तक भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ब्रांड इमेज काफी मजबूत है और इसके आसपास भी कोई नहीं दिख रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की एक मजबूत छवि बानी है जिसमें उनका प्रभाव एक बहुत बड़े राजनेता के रूप में भाषित होता है । उन्होंने अपने प्रभाव को अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर भी काफी मजबूती से पेश किया है । शक्तिशाली देशों के नेताओं के साथ उनकी निकटता और सम्बन्ध उनकी छवि को और मजबूती प्रदान करता है ।
जहाँ तक श्री राहुल गाँधी का सवाल है, उनका व्यक्तित्व पर हमेशा एक प्रश्नचिन्ह लगता रहा है कि वह एक गंभीर राजनितज्ञ नहीं हैं या राजनीती कोई गंभीरता से नहीं लेते हैं । श्री राहुल गाँधी का यह कहना की उनके इस व्यक्तित्व को जनता के बीच में बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने काफी पैसे खर्च किये हैं, इसमें मीडिया का बहुत बड़ा योगदान रहा है । और इस छवि को उन्होंने इस भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से तोड़ दिया है ।

इन सभी सन्दर्भों को ध्यान में रखते हुए, हम इस बात की विवेचना करेंगे कि क्या सचमुच भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गाँधी के छवि में सुधार हुआ है । तो इस बात का एक जवाब है - हाँ, बहुत ही शानदार तरीके से । उनकी लगातार यात्रा ने उनकी इस छवि को एकदम से पलट दिया है कि वह एक पूर्णकालिक राजनेता नहीं हैं । यह पूरी भारत जोड़ो यात्रा में कहीं से कोई बनावटीपन नहीं लग रहा है । पूरी यात्रा एक स्वाभाविक गति से चल रही है और काफी प्राकृतिक लग रही है । राहुल गाँधी ने इस पूरी यात्रा के दौरान लगभग जितने भी प्रेस कांफ्रेंस किये हैं वो काफी परपक्व लग रहा है । इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि वो उनका उद्देश्य काफी साफ़ है और उनको यह पता है कि आगे क्या करना है ।

इस यात्रा के दौरान अगर हम इस बात पर गौर करें की आगे की कांग्रेस पार्टी कैसी होगी तो यह भी लगभग श्री राहुल गाँधी से साफ कर दिया है । कांग्रेस के जो भी धाकड़ नेता पार्टी को छोड़कर गए हैं, उनकी जगह पार्टी में आगे शायद ही कभी हो पायेगी । आगे शायद पार्टी में वही लोग चल पाएंगे जो की २०२४ के चुनाव तक जी जान लगा कर पार्टी के लिए काम कर पाने में समर्थ हों ।


राहुल गाँधी के साथ चलती हुयी भीड़ ने यह साबित किया है कि अभी भी गाँधी परिवार अगर सड़क पर आकर लड़े तो उसे जनता का बहुत व्यापक समर्थन प्राप्त होगा । साथ ही यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि जनता का एक बहुत बड़ा प्रतिशत है जो यह मानता है कि एक मजबूत विपक्ष का होना इस देश के लिए बहुत ही जरुरी है और यह बात कांग्रेस पार्टी के पक्ष में जाती है ।
बहुत से लोग अब इस बात को मानने लगे हैं की रही गाँधी की सोच नोटबंदी और कोरोना के बारे में काफी हद तक सही थी और यह उनके दूरदर्शिता को दर्शाता है ।


इस पुरे यात्रा के दौरान भारतीय जनता पार्टी यह तलाशती रही की राहुल गाँधी को किस मुद्दे पर घेरा जाय और वह इस बात में बुरी तरह असफल रही है ।
यह बात बहुत ही स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गाँधी ने अपने आपको भारतीय राजनीती में मजबूती से स्थापित किया है ।
 

अगर राहुल गाँधी को इस यात्रा से कांग्रेस को वापस सामने लाना है तो उनको आनेवाले दिनों के विधानसभा चुनाव में काफी मेहनत करनी होगी और उनको यह सामने से एक लीडर की भांति लड़ना होगा । हरेक राज्य के विधान सभा चुनाव में उनको काफी समय और प्रचार करना होगा जिस प्रकार श्री नरेंद्र मोदी जी ने गुजरात चुनाव में किया है । श्री राहुल गाँधी को यह ध्यान रखना होगा कि उनके सामने एक ऐसी पार्टी है जो उनकी हरेक कमजोरी और गलती का पूरा फायदा उठाना जानती है।

सोमवार, 19 दिसंबर 2022

भारतीय अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी की समस्या एवं समाधान

अर्थव्यवस्था का सीधा सम्बन्ध रोजगार के अवसर प्रदान करने से है । अर्थव्यवस्था का बड़ा होना और विकास की गति तेज होना क्या रोजगार के उतने अवसर प्रदान करते हैं, जिसकी कल्पना या तो जान मानस करने लगता है या फिर राजनेता उनको बताते हैं ।

आज हम इस बात की विवेचना करेंगे की अर्थव्यवस्था का विस्तार और विकास से रोजगार प्रदान करने का अवसर किस अनुपात में निर्भर करता है । इस बात की समीक्षा हम भारत के आजादी के बाद से करेंगे क्योंकि सही मायने में हमारी अर्थव्यस्था में उतर चढ़ाव को आजादी के बाद से ही महसूस किया जा सकता है ।

भारत ने आजादी के बाद से मिक्स्ड इकॉनमी यानि मिश्रित अर्थव्यस्था को अपनाया । इस अर्थव्यस्था के प्रारूप में विदेशी निवेशक को प्रतिबंधित क्या गया कुछ क्षेत्रों को छोड़कर । यहाँ तक की प्राइवेट इन्वेस्टमेंट भी कुछ ही क्षेत्र में उपलब्ध थे । सरकार ने अपना इन्वेस्टमेंट कर पब्लिक उद्योगों को तैयार किया जो की भारत की जरूरतों को पूरा कर सके तथा अर्थव्यस्था को पटरी पर ला सके । पब्लिक उपक्रम ने कई क्षेत्रों में बेहतरीन काम किया और स्थायी रोजगार का प्रयाय बना । ये सभी पब्लिक उपक्रम धीरे धीरे भारतीय अर्थव्यस्था की रीढ़ बन गए । वर्तमान समय में इस बात किस समीक्षा भले ही की जा सकती है कि इन पब्लिक उपक्रमों से भारतीय अर्थव्यस्था को कितना फायदा या नुकसान पहुंचा । जब भारत विदेशी पूंजी के आभाव से जूझ रहा था और भारतीय स्वर्ण भंडार को गिरवी रखना पड़ा तब जाकर विदेशी निवेश को भारत में खोला गया । विदेशी निवेशकों को दूर रखने का एक कारण शायद भारतवर्ष की लम्बी गुलामी का कारण हो सकता है ।

भारत में सही मायने में अर्थव्यस्था का विस्तार १९९१ से शुरू हुआ जब वित्मंत्री डॉ मनमोहन सिंह और तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव ने भारतीय बाजार को विदेशी निवेशकों के लिए खोला । इसका फायदा भारतीय विदेशी मुद्रा कोष का बढ़ना और कई क्षेत्रों में नए रोजगार का सृजन होना था ।

अगर हम वर्ष १९९१ के बाद से देखें तो अर्थव्यवस्था का क्रमशः विकास होता गया और रोजगार के नए अवसर पैदा होते गए । लोगों की आर्थिक उन्नति होती गयी और व्यय करने की शक्ति में भी काफी सुधार हुआ । हमें इस बात पर गौर करना होगा की यह सुधार काफी निचले पायदान पर हुआ जिसमे नरेगा जैसी सरकारी योजनाओं का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा ।

लेकिन अब एक सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब सरकार इतना प्रयास कर रही है फिर भी रोजगार के नए अवसर पैदा होते नहीं दिखाई दे रहे हैं साथ ही बेरोजगारी का भी स्तर भी लगातार बढ़ता ही जा रहा है । अगर हम समसामयिक स्थिति की विवेचना करें तो कुछ बिंदुओं पर हमें ध्यान देना होगा, जो इस परिस्थिति के मुख्य कारण हो सकते हैं -

पहला, कोरोना के बाद से लगभग विश्व के लगभग सारे देशों ने आर्थिक समस्या का सामना किया है । लोकडाॅन से व्यवसायों का बंद होना और असंगठित क्षेत्रों में रोजगार का ख़त्म होना, ने एक प्रकार की नयी चुनौती अर्थव्यवस्था के समक्ष खङी कर दी जो कि नोटबंदी के उभर कर बहार आने की कोशिश कर रही थी ।

दूसरा, रूस और यूक्रेन के युद्ध ने लॉजिस्टिक की समस्या पैदा कर दी जिससे डिमांड और सप्लाई काफी हद तक प्रभावित हुयी ।

तीसरा, भारत में जितने भी सरकारी पद खाली हैं उनमें भतिॆयों में देरी भी और नए पद का सृजन नहीं होने से शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में कोई कमी नहीं हो रही है । सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सरकारी कर्मचारी एक बहुत बड़ा प्रतिशत है जो कि अर्थव्यवस्था में डिमांड उत्पन्न करता है ।

चौथा, यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि बहुत बड़े गैर सरकारी उद्योगों और संस्थानों को मदद देना, थोड़ी बहुत तो रोजगार के अवसर प्रदान कर सकता है लेकिन उस मात्रा में नहीं जिसकी अभी जरुरत है । इसका मुख्य कारण निजी उद्योगों द्वारा ऑटोमेशन और रोबोटिक्स का प्रयोग है जिससे मानव रहित उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, लागत मूल्य को कम करने के लिए । आने वाले दिनों में यह चुनौती और भी गंभीर होती जाएगी ।

पांचवा, सरकार को यह चाहिए की बहुत ही छोटे और लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देना चाहिए जो की सरकार अभी मुद्रा लोन द्वारा कर रही है । लेकिन इसका क्रियान्वन का प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा है । इसका समग्रता से अध्ययन होना चाहिए और सरकार को चाहिए की हरेक मुद्रा लोन लेने वालों का फीडबैक ले और यह तय करे की उसने इस लोन का कितने प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया है ।  यह सरकार को आगे का रोडमैप देगा जो बेरोजगारी दर को काम करने में सरकारी योजनाओ को मदद देगा ।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

 राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra by Rahul Gandhi ) - विवेचना

राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा

आज हम इस बात की विवेचना करेंगे की श्री राहुल गाँधी द्वारा की जा रही भारत जोड़ो यात्रा का कितना फायदा उनकी छवि, कांग्रेस पार्टी को पहुंचेगा और यह भारतीय जान मानस के लिए कितना प्रभावी होगा । किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले हम इसकी विवेचना व्यापाक रूप से ऐतिहासिक, सामाजिक एवं विश्लेषलात्मक सन्दर्भ में करेंगे ।

अगर हम यात्राओं का इतिहास देखें तो यह काफी पुराना है और यह बात सर्वविदित है कि इससे यात्रा करने वालों को कोई न कोई फायदा ही हुआ है । महात्मा गाँधी द्वारा दांडी मार्च जो की 1930 में किया गया था जो की भारत के स्वंत्रता इतिहास में मील का पत्थर है । भारत के  स्वंत्रता संग्राम में इस मार्च का एक महत्वपूर्ण स्थान है जिसको भारतीय नागरिकों का एक व्यापक समर्थन मिला था । तदुपरांत विनोबा भावे का भूदान आंदोलन अपने आप में एक अनोखा आंदोलन था । १९५१ ई० में शुरू किया गया यह आंदोलन उनकी पदयात्रा के साथ साथ चला । फिर क्रमिक रूप से अगर हम देखें तो चंद्रशेखर एवं वाय एस राजशेखर रेड्डी की यात्रा बहुत महत्वापूर्ण रही ।

राहुल गाँधी की यह पदयात्रा कई मायनो में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सबसे लम्बी यात्रा हो रही तथा कन्याकुमारी से शुरू होकर कश्मीर तक जा रही है ।  इस यात्रा के तहत लगभग १२ राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेश जोड़े गए हैं । अभी तक जिन सभी राज्यों से होकर यह यात्रा गुजर रही है वहां पर इसे अभूतपूर्व स्वागत मिल रहा है और सभी वर्ग के लोग इससे जुड़ रहे हैं । लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है कि इस यात्रा से राहुल गाँधी और कांग्रेस को क्या फायदा मिल सकता है या यह सिर्फ एक यात्रा ही बनकर रह जाएगी ।

सबसे पहले कांग्रेस पार्टी की स्वॉट एनालिसिस करते हैं और इस बात को जानने का प्रयास करते हैं कि यह यात्रा किस हद तक कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है । इस यात्रा के बाद, कौन कौन से क्षेत्र में पार्टी को ध्यान देने की जरूरत होगी और भारतीय जनता पार्टी को किस तरह यह यात्रा आने वाले दिनों के चुनाव में परेशान कर सकती है ।

स्वॉट एनालिसिस में चार वर्ड हैं पहला स्ट्रेंग्थ, दूसरा वीकनेस, तीसरा अपोटॊयूनिटी  एवं चौथा थ्रेट ।

अब इस यात्रा का कांग्रेस पार्टी के परिपेक्षय में हम स्वॉट एनालिसिस  करेंगे और जानने की कोशिश करेंगे की कौन कौन सी ऐसी जगह है जहाँ इस यात्रा का फायदा हो सकता है और किन जगहों पर पार्टी को ध्यान देने की जरुरत हो सकती है ।

पहला स्ट्रेंग्थ

अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी, भारत की सबसे पुरानी पार्टी है जिसका मूल उद्देश्य भारतीय स्वंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना था । कालांतर में यह पार्टी स्वाधीनता के बाद सत्ता में आयी और काफी लम्बे समय तक सत्ता में रही । इस पार्टी की सबसे बड़ी ताकत यह है की इसकी उपस्थिति भारत के लगभग हर गांव और शहर में है और किसी न किसी तौर से लोग इस पार्टी से एक जुड़ाव महसूस करते हैं । इस पार्टी की आइडियोलॉजी से सभी वाकिफ हैं और किसी को इस पार्टी के इतिहास के बारे में अलग से बताने की जरुरत नहीं है । इस पार्टी का विस्तार पुरे भरतवर्ष में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम में है । यह इस पार्टी की सबसे बड़ी ताकत है जो की आज की तारीख में भारत के किसी भी पार्टी के पास नहीं है यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी के पास भी नहीं जो की विश्व की सबसे बड़ी पार्टी मानी जाती है ।

यात्रा का प्रभाव -

- यह यात्रा कांग्रेस के समर्थको या पूर्व समर्थको जो कि अपने आप को एक लीडरशिप विपन्नता की स्थिति में मानते है, को सोचने को मजबूर करेगा ।

- यह कांग्रेस की छवि को बेहद मजबूत कर रहा है कि यह पार्टी जमीन पर जनता के साथ, जनता के मुद्दों के लिए खडी है ।

- लोग पार्टी से खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं ।

दूसरा वीकनेस

कांग्रेस पार्टी जब से सत्ता से गयी है, उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उनके मठाधीश नेता रहे हैं । इन नेताओं का जनता से संवाद लगभग नहीं का रहा है और ये सभी अपने कार्यकर्ताओं से भी काफी दूर चले गए । संगठन का अभाव, कार्यकर्ताओं में उत्साह का आभाव और एक लीडरशिप की कमी जो कार्यकर्ताओं में जोश पैदा कर सके । मौकापरस्त नेताओं द्वारा पार्टी से पलायन ने भी पार्टी की छवि को काफी नुकसान पहुँचाया है ।

यात्रा का प्रभाव -

- इस यात्रा में यह भी पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है कि पार्टी छोड़कर जानेवाले और पार्टी के खिलाफ टिप्पणी करने वालों के लिए अब कोई जगह नहीं है

- नेताओं के पास पूरा मौका है कि वो जनता से रु-ब-रु होकर उनकी समस्याओं को सुने । यह काम राहुल गाँधी बखूबी कर रहें हैं पर जरुरत ये भी है कि उस प्रदेश के नेता जहाँ से यात्रा गुजर रही है जनता के समस्याओं को ध्यान से सुने और कांग्रेस जो भी प्रेस ब्रीफिंग करती है उसमे उन नेताओं को तरजीह देनी चाहिए ।

- इस यात्रा ने राहुल गाँधी को एक नए रूप से निखार दिया है जो की कांग्रेस पार्टी की वीकनेस को ताकत में परिवर्तित कर दिया है और आने वाले दिनों में इसका प्रभाव दूरगामी होने जा रहा है ।

तीसरा अपोटॊयूनिटी 

कांग्रेस पार्टी के लिए अब खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा है और वह जीरो से शुरू कर रही है । अगर इस सन्दर्भ में देखें तो पूरा देश उनके लिए एक अपोटॊयूनिटी  के रूप में परिलक्षित हो रहा है

यात्रा का प्रभाव -

- यह यात्रा कांग्रेस में एक प्रकार से संजीविनी का काम करेगी ।

- कांग्रेस को जनता के मुद्दों से भटकना नहीं चाहिए जिसपर की पार्टी अभी तक अडिग है ।

- यह कांग्रेस मुक्त भारत के मिथ को पूरी तरह से ख़तम कर देगी ।

- विपक्षी दलों में कांग्रेस की स्थिति मजबूत होगी ।

एवं चौथा थ्रेट

कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे बड़ी थ्रेट आम आदमी पार्टी है न की भारतीय जनता पार्टी । आम आदमी पार्टी की पहुँच धीरे धीरे बढ़ रही है और इस पार्टी की राजनीती के कारण कांग्रेस को आने वाले दिनों में साउथ में नुकसान हो सकता है जिसका अभी तक उसको अंदाजा नहीं है । दूसरी सबसे बड़ी समस्या इस यात्रा के बाद भारतीय जनता पार्टी द्वारा किसी मेगा इवेंट का होना होगा जिसका उद्द्शेय इस यात्रा के प्रभाव को हल्का करना तथा नया नैरेटिव सेट करना होगा । इस थ्रेट का आकलन कांग्रेस पार्टी को अभी से करना होगा ।

अगर इस यात्रा का आकलन करें तो यह कांग्रेस पार्टी के लिए वरदान साबित होगी ।

मैं अपने अगले ब्लॉग में इस विषय के ऊपर विवेचना करूँगा की इस यात्रा के बाद कांग्रेस पार्टी या राहुल गाँधी का अगला कदम क्या हो सकता है और भारतीय जनता पार्टी इस यात्रा का कैसे काउंटर नैरेटिव सेट करती है