सोमवार, 19 दिसंबर 2022

भारतीय अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी की समस्या एवं समाधान

अर्थव्यवस्था का सीधा सम्बन्ध रोजगार के अवसर प्रदान करने से है । अर्थव्यवस्था का बड़ा होना और विकास की गति तेज होना क्या रोजगार के उतने अवसर प्रदान करते हैं, जिसकी कल्पना या तो जान मानस करने लगता है या फिर राजनेता उनको बताते हैं ।

आज हम इस बात की विवेचना करेंगे की अर्थव्यवस्था का विस्तार और विकास से रोजगार प्रदान करने का अवसर किस अनुपात में निर्भर करता है । इस बात की समीक्षा हम भारत के आजादी के बाद से करेंगे क्योंकि सही मायने में हमारी अर्थव्यस्था में उतर चढ़ाव को आजादी के बाद से ही महसूस किया जा सकता है ।

भारत ने आजादी के बाद से मिक्स्ड इकॉनमी यानि मिश्रित अर्थव्यस्था को अपनाया । इस अर्थव्यस्था के प्रारूप में विदेशी निवेशक को प्रतिबंधित क्या गया कुछ क्षेत्रों को छोड़कर । यहाँ तक की प्राइवेट इन्वेस्टमेंट भी कुछ ही क्षेत्र में उपलब्ध थे । सरकार ने अपना इन्वेस्टमेंट कर पब्लिक उद्योगों को तैयार किया जो की भारत की जरूरतों को पूरा कर सके तथा अर्थव्यस्था को पटरी पर ला सके । पब्लिक उपक्रम ने कई क्षेत्रों में बेहतरीन काम किया और स्थायी रोजगार का प्रयाय बना । ये सभी पब्लिक उपक्रम धीरे धीरे भारतीय अर्थव्यस्था की रीढ़ बन गए । वर्तमान समय में इस बात किस समीक्षा भले ही की जा सकती है कि इन पब्लिक उपक्रमों से भारतीय अर्थव्यस्था को कितना फायदा या नुकसान पहुंचा । जब भारत विदेशी पूंजी के आभाव से जूझ रहा था और भारतीय स्वर्ण भंडार को गिरवी रखना पड़ा तब जाकर विदेशी निवेश को भारत में खोला गया । विदेशी निवेशकों को दूर रखने का एक कारण शायद भारतवर्ष की लम्बी गुलामी का कारण हो सकता है ।

भारत में सही मायने में अर्थव्यस्था का विस्तार १९९१ से शुरू हुआ जब वित्मंत्री डॉ मनमोहन सिंह और तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव ने भारतीय बाजार को विदेशी निवेशकों के लिए खोला । इसका फायदा भारतीय विदेशी मुद्रा कोष का बढ़ना और कई क्षेत्रों में नए रोजगार का सृजन होना था ।

अगर हम वर्ष १९९१ के बाद से देखें तो अर्थव्यवस्था का क्रमशः विकास होता गया और रोजगार के नए अवसर पैदा होते गए । लोगों की आर्थिक उन्नति होती गयी और व्यय करने की शक्ति में भी काफी सुधार हुआ । हमें इस बात पर गौर करना होगा की यह सुधार काफी निचले पायदान पर हुआ जिसमे नरेगा जैसी सरकारी योजनाओं का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा ।

लेकिन अब एक सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब सरकार इतना प्रयास कर रही है फिर भी रोजगार के नए अवसर पैदा होते नहीं दिखाई दे रहे हैं साथ ही बेरोजगारी का भी स्तर भी लगातार बढ़ता ही जा रहा है । अगर हम समसामयिक स्थिति की विवेचना करें तो कुछ बिंदुओं पर हमें ध्यान देना होगा, जो इस परिस्थिति के मुख्य कारण हो सकते हैं -

पहला, कोरोना के बाद से लगभग विश्व के लगभग सारे देशों ने आर्थिक समस्या का सामना किया है । लोकडाॅन से व्यवसायों का बंद होना और असंगठित क्षेत्रों में रोजगार का ख़त्म होना, ने एक प्रकार की नयी चुनौती अर्थव्यवस्था के समक्ष खङी कर दी जो कि नोटबंदी के उभर कर बहार आने की कोशिश कर रही थी ।

दूसरा, रूस और यूक्रेन के युद्ध ने लॉजिस्टिक की समस्या पैदा कर दी जिससे डिमांड और सप्लाई काफी हद तक प्रभावित हुयी ।

तीसरा, भारत में जितने भी सरकारी पद खाली हैं उनमें भतिॆयों में देरी भी और नए पद का सृजन नहीं होने से शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में कोई कमी नहीं हो रही है । सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सरकारी कर्मचारी एक बहुत बड़ा प्रतिशत है जो कि अर्थव्यवस्था में डिमांड उत्पन्न करता है ।

चौथा, यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि बहुत बड़े गैर सरकारी उद्योगों और संस्थानों को मदद देना, थोड़ी बहुत तो रोजगार के अवसर प्रदान कर सकता है लेकिन उस मात्रा में नहीं जिसकी अभी जरुरत है । इसका मुख्य कारण निजी उद्योगों द्वारा ऑटोमेशन और रोबोटिक्स का प्रयोग है जिससे मानव रहित उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, लागत मूल्य को कम करने के लिए । आने वाले दिनों में यह चुनौती और भी गंभीर होती जाएगी ।

पांचवा, सरकार को यह चाहिए की बहुत ही छोटे और लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देना चाहिए जो की सरकार अभी मुद्रा लोन द्वारा कर रही है । लेकिन इसका क्रियान्वन का प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा है । इसका समग्रता से अध्ययन होना चाहिए और सरकार को चाहिए की हरेक मुद्रा लोन लेने वालों का फीडबैक ले और यह तय करे की उसने इस लोन का कितने प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया है ।  यह सरकार को आगे का रोडमैप देगा जो बेरोजगारी दर को काम करने में सरकारी योजनाओ को मदद देगा ।

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